तेल बाजारों के लिए कितने मायने रखता है ईरान का भविष्य?

ऊर्जा और संसाधन विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान की स्थिति नियंत्रण से बाहर होती है, तो इससे वैश्विक स्तर पर तेल और वित्तीय बाजारों पर बहुत बड़ा असर पड़ेगा। वेनेजुएला में निकोलस मादुरो को हटाए जाने के बाद ऐसा नहीं हुआ था। लेकिन ईरान के मामले ने सभी को चिंता में डाल दिया है क्योंकि ईरान, वेनेजुएला की तुलना में चार गुना अधिक तेल का उत्पादन करता है।
आंद्रेयास गोल्डथाउ, जर्मनी की एरफर्ट यूनिवर्सिटी के विली ब्रांट स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी के डायरेक्टर हैं। वह कहते हैं, "ओपेक देशों में ईरान तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक है। दुनिया की कुल तेल मांग का लगभग 4 फीसदी हिस्सा ईरान से आता है, जबकि वेनेजुएला सिर्फ 1 फीसदी ही उत्पादन करता है।” वह आगे बताते हैं, "अनुमान है कि ईरान रोजाना लगभग 20 लाख बैरल निर्यात करता है, जबकि वेनेजुएला सिर्फ 3,50,000 बैरल। अगर ईरान का उत्पादन बंद हो जाए, तो वैश्विक स्तर पर इसका असर कहीं ज्यादा होगा।”
इसके अलावा, खाड़ी देशों में क्षेत्रीय युद्ध छिड़ने का डर ईरान के मामले में बहुत ज्यादा है। गोल्डथाउ कहते हैं कि दुनिया के तेल भंडार का लगभग आधा हिस्सा और वैश्विक तेल उत्पादन का एक-तिहाई हिस्सा मध्य पूर्व में है। इसलिए, ईरान के राजनीतिक घटनाक्रम वेनेजुएला की तुलना में बाजारों पर कहीं ज्यादा गहरा असर डालते हैं।
ओपेक के आंकड़ों के मुताबिक, वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार यानी 303 अरब बैरल है। लेकिन यह सारा तेल ‘हैवी क्रूड' (भारी कच्चा तेल) है, जिसे निकालने और साफ करने के लिए बहुत उन्नत और खास तकनीक की जरूरत होती है। साथ ही, इस तेल का एक बड़ा हिस्सा दूरदराज के ओरिनोको बेल्ट में है, जहां पहुंचना आसान नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से परेशान हैं ईरान और वेनेजुएला
वेनेजुएला की तरह ईरान भी अपने तेल उद्योग पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की मार झेल रहा है। उसके पास ड्रिलिंग और तेल निकालने की आधुनिक तकनीक नहीं है। रिप्लेसमेंट पार्ट्स की कमी व पर्याप्त निवेश न होने की वजह से रखरखाव बहुत महंगा हो गया है।
गोल्डथाउ कहते हैं कि उद्योग पर सरकारी नियंत्रण होने से विदेशी निवेश मिलना और भी मुश्किल है। रिफाइनिंग की स्थिति भी खराब है। उनके कारखाने उस गुणवत्ता का पेट्रोल या डीजल नहीं बना पा रहे हैं जिसकी पश्चिमी देश उम्मीद करते हैं। प्रतिबंधों के अलावा, यह ईरान के ‘मिडस्ट्रीम' सेक्टर (पाइपलाइन और स्टोरेज) पर अमेरिका और इस्राएल के हमलों का नतीजा है।
ऑयल और गैस सेक्टर में ‘मिडस्ट्रीम' का अर्थ है कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस को जमीन से निकालने के बाद उनका परिवहन, भंडारण और शुरुआती प्रसंस्करण। अमेरिका स्थित ‘जीपीए मिडस्ट्रीम एसोसिएशन' के अनुसार, मिडस्ट्रीम कंपनियों का मुख्य काम लॉजिस्टिक्स को बेहतर बनाना और समय पर डिलीवरी सुनिश्चित करना है, चाहे ईरान या वेनेजुएला जैसे देशों में उत्पादन में कितना भी उतार-चढ़ाव क्यों न आए।
गोल्डथाउ कहते हैं कि अपनी समस्याओं के बावजूद, ईरान का तेल क्षेत्र आश्चर्यजनक रूप से मजबूत साबित हुआ है, कम से कम जमीन से तेल निकालने की मात्रा के मामले में। हालांकि, यह कभी भी उस 60 लाख बैरल के आंकड़े तक नहीं पहुंच पाया, जो 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले था।
वह आगे बताते हैं, "1980 के दशक में उत्पादन गिरकर 20 लाख बैरल रह गया था, जो बाद में सुधरा और लगभग 40 लाख बैरल प्रतिदिन पर स्थिर हो गया। इसके बावजूद, सरकारी खजाने की हालत खराब है, क्योंकि ईरान को खरीदार ढूंढने के लिए सालों से अपना तेल सस्ते दाम पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इस वजह से उद्योग में जरूरी निवेश नहीं हो पा रहा है।”
ईरान का शैडो फ्लीट, स्मगल किया हुआ तेल ले जाने में अहम
रूस की तरह ईरान का भी तेल टैंकरों का एक ‘शैडो फ्लीट' यानी गुप्त जहाजी बेड़ा है, जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। गोल्डथाउ बताते हैं, " पश्चिमी प्रतिबंधों की वजह से ईरान को अपने उत्पादन का कुछ हिस्सा स्टोर करके रखना पड़ता है। चूंकि जमीन पर तेल रखने की जगह कम है, इसलिए अब विशाल टैंकरों का इस्तेमाल ‘समुद्र में तैरते गोदामों' के रूप में किया जाता है।
ये तैरते हुए गोदाम ज्यादातर दक्षिण पूर्व एशिया में चीन जैसे खरीदारों के पास लंगर डाले रहते हैं। चीन ईरान के कुल तेल उत्पादन का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा खरीदता है।
गोल्डथाउ कहते हैं, "मलेशिया के तट से दूर खुले समुद्र में ईरानी तेल की काफी मात्रा मौजूद है। तेहरान इस ऑपरेशन के लिए अपनी नेशनल ईरानी टैंकर कंपनी का इस्तेमाल कर रहा है। उसके पास दुनिया के सबसे बड़े टैंकर बेड़े हैं।”
प्रतिबंधों से बचने के लिए, ईरानी जहाज वैसे ही काम करते हैं जैसे रूसी जहाज करते हैं। डिलीवरी आसान बनाने के लिए प्रतिबंधित ईरानी तेल को समुद्र में गैर-ईरानी झंडे वाले जहाजों में ट्रांसफर करते हैं।
ईरान में बदतर हो रही सामाजिक स्थिति
ईरान की सामाजिक स्थिति काफी हद तक वेनेजुएला जैसी ही है। तेल के पुराने और जर्जर बुनियादी ढांचे के कारण समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। सरकार लोगों को सस्ता तेल और बिजली देने के लिए जो सब्सिडी देती है, उस पर बजट का बहुत बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है। इसके कारण सरकार के लिए जनता को सस्ती ऊर्जा देना मुश्किल होता जा रहा है। इसका नतीजा क्या निकला? आर्थिक संकट, मुद्रा की कीमत गिरना, बेतहाशा महंगाई और पूरे देश में विरोध प्रदर्शन।
यह एक ऐसी स्थिति है जो तेहरान के शासकों के लिए बहुत बड़ा खतरा बन सकती है। अगर तेल के क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारी भी विरोध प्रदर्शनों में शामिल हो जाते हैं, तो यह ईरान की धार्मिक सत्ता के अंत की शुरुआत हो सकती है। अभी यह साफ नहीं है कि अशांति ईरान के सबसे महत्वपूर्ण तेल क्षेत्र, खुजेस्तान प्रांत तक पहुंची है या नहीं। अमेरिकी मैगजीन ‘फॉर्च्यून' के अनुसार, अभी तक ऐसे कोई संकेत नहीं मिले हैं कि ईरान के तेल निर्यात में कोई कमी आई है।
फिर भी, यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि अगर तेल कर्मचारी ईरान के आखिरी शाह के निर्वासित बेटे, रजा पहलवी की बात मानकर हड़ताल कर देते हैं, तो क्या होगा। 1978 में भी तेल कर्मचारियों की हड़ताल ने ही शाह की सत्ता को उखाड़ फेंका था। उन पर दबाव इतना बढ़ गया था कि कुछ ही महीनों में राजशाही खत्म हो गई और उनकी जगह कट्टरपंथी शिया धर्मगुरु अयातोल्लाह अली खामेनेई ने ले ली थी।
अगर ईरान की इस्लामिक सरकार गिरती है, तो इससे पूरे क्षेत्र में शक्ति का संतुलन पूरी तरह बदल जाएगा। एशिया के विकासशील देशों में निवेश से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ मार्क मोबियस चेतावनी भरे लहजे में कहते हैं, "सबसे अच्छा नतीजा तो पूरी तरह सत्ता परिवर्तन होगा। लेकिन सबसे बुरा यह होगा कि देश के अंदर आपसी लड़ाई चलती रहे और मौजूदा सरकार ही बनी रहे।”
क्या जल्द ही तेल 120 डॉलर प्रति बैरल हो जाएगा?
अगर ईरान का तेल उत्पादन रुकता है, तो थोड़े समय के लिए तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। लेकिन धीरे-धीरे दूसरे तेल उत्पादक देश ईरान की कमी को पूरा कर देंगे। ऊर्जा विशेषज्ञ गोल्डथाउ का कहना है कि बाजार की हालत स्थिर करने के लिए ‘इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी' (आईईए) के आपातकालीन तेल भंडार का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
वह आगे कहते हैं कि असली और बड़ी समस्या तब होगी जब "ईरानी पक्ष इस संघर्ष को पूरे क्षेत्र में फैला देंगे।” जेपी मॉर्गन चेज जैसे इन्वेस्टमेंट बैंकों का अनुमान है कि अगर ईरान ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' का रास्ता बंद कर देता है, तो तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। यह एक बहुत ही संकरा समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया का करीब 25 फीसदी तेल गुजरता है।
अंत में, पड़ोसी देशों के तेल कुओं और रिफाइनरियों पर भी हमले हो सकते हैं। इससे तेल बाजारों पर बुरा असर पड़ेगा। विशेषज्ञ गोल्डथाउ चेतावनी देते हैं कि दुनिया के लगभग 20 फीसदी एलएनजी का परिवहन भी इसी समुद्री रास्ते से होता है। अगर ऐसा हुआ, तो यूरोप में गैस की कीमतें भी काफी बढ़ सकती हैं।
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