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पूरी मानव जाति को अंतर्मुख होने का समय : प्रा. डाॅ. विश्वनाथ कराड

मराठी नववर्ष गुढ़ी पाडवा की पूर्वसंध्या पर दिया संदेश

File Photo

पुणे - इस समय कोरोना वाइरस के संक्रमण के चलते पूरी दुनिया में हड़कम्प मचा हुआ है. इस भयंकर महामारी को खत्म करने के लिए पूरा विश्व अपनी एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है, लेकिन यह महामारी है कि, थमने का नाम ही नहीं ले रही. ऐसे में महान दार्शनिक संत ज्ञानेश्वर तथा जगद्गुरू तुकाराम महाराज द्वारा दिया गया सदेश हमें अपनाने की जरुरत है, ऐसा संदेश एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी के संस्थापक अध्यक्ष प्रा. डाॅ. विश्वनाथ कराड ने दिया.

आज की स्थिति पर मंतव्य देते हुए कराड ने कहा कि,  इन दोनों ही महान संतों ने हमें पर्यावरण के साथ एकरूप होने का संदेश दिया है. ऐसा किया तो ही हम आने वाली शताब्दीयों में मनुष्य सुख और चैन से जीवनयापन कर सकता है. आज हम आधुनिक तकनीक के बलबुते और स्वास्थ्य सेवाओं में हुए विकास के दम पर इस संकट पर विजय प्राप्त कर भी लेंगे, लेकिन भविष्य में फिर इस तरह का कोई संकट ना आएंं, इस पर हमें अंतर्मुख होकर संजीदगी के साथ विचार करने की आवश्यकता है.

उन्होंने कहा कि, कोरोना वाइरस एक अतिसूक्ष्म विषाणू है, जिसने आज पूरे विश्व को घूटने टेकने पर मजबूर किया है. सुपर पाॅवर कहे जाने वाले अमरीका, चाइना, ब्रीटेन, फ्रान्स, रूस जैसे देश हों या इटली, जर्मनी,  इरान, कैनडा इन सभी देशों में इस समय त्राहीमाम मचा हुआ है.

इस विषाणू की उत्पत्ति कहां हुई और कैसे हुई, इसके क्या कारण थे, इस विषय में काफी ज्यादा लिखा और बोला जा रहा है. लेकिन इसमें प्रकृति और पर्यावरण को पहुंचाई गई हानि या उससे दूर जा रही मानव जाति के संदर्भ में कोई चर्चा नहीं हो रही है. इसी का नतीजा है कि, आज पूरा विश्व इसके गंभीर नतीजे भूगत रहा है.

उत्पत्ति के साथ ही मनुष्य ने हर एक चीज के लिए काफी संघर्ष किया है. प्रकृति से लेकर मानवी समाज तक अशांति फैलाने वाला मानव ही है. केवल अपने भौतिक सुखों की आपूर्ति के लिए मनुष्य कदम-कदम पर प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर उसे नुकसान पहुंचाने का काम कर रहा है.

आज विश्व की महासत्ताओं समेत विभिन्न देशों के पास पूरी पृथ्वी को कम से कम 10 हजार बार पूरी तरह से नष्ट कर सकें, ऐसे घातक हथियार मौजूद है. इसमें परमाणु बम, हाइड्रोजन बम, न्यूट्राॅम बम का समावेश है. इन सभी के उत्पादन के चलते हम विनाश की ओर यात्रा कर रहे है. इससे हमें बचना होगा और प्रकृति का दोहन रोकना होगा. इसके लिए संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम द्वारा दी गई मानवता और प्रकृति संवर्धन की शिक्षा पर जोर देना होगा.

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