अमरीका और तालिबान में हुआ ऐतिहासिक शांति करार
18 वर्षों से चले आ रहे सशस्त्र संघर्ष थमने की अपेक्षा
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इस शांति करार पर तालिबान और अमेरीका दोनों के ही अधिकारियों ने हस्ताक्षर करते हुए इसे अमल में लाने का संकल्प किया. इस शांति करार के बाद अमेरीका अगले 14 महिनों में अफगानिस्तान से अपने साढ़े आठ हजार सैनिकों को वापिस बुला लेगा.
ज्ञात हों कि, 11 सितम्बर 2001 को अमरीका में चार विमानों का अपहरण कर उसे उसे अमरीकी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के दो गगनचुंबी टाॅवर, एक अमरीका का सैनिक मुख्यालय पेन्टॅगाॅन से टकराया गया था. साथ ही एक विमान पेनसिल्वेनिया के जंगलों में गिर गया था. इस हमले में अमरीका के साढ़े तीन हजार से लोग मारे गए थे.
अमरीका की खुफिया एजेन्सी सीआईए ने इस मामले की जांच करवाई तो पता चला कि, यह हमला अल-कायदा के सरगना ओसामान बीन लादेन ने करवाए थे. तब ओसामा अफगानिस्तान में छुपा बैठा था. उस समय अफगानिस्तान में इस्लामिक चरमपंथी गुट तालिबान का शासन चलता था.
अमेरीका ने तालिबान की ओर ओसामा को सौंपने की मांग की थी, जिसे अफगानिस्तान में ठुकरा दिया था. इसके बाद अमरीका ने अफगानिस्तान पर हमला कर तालिबान की सत्ता को उखाड़ फेंका था. तभी से अमरीका और तालिबान में सशस्त्र संघर्ष चल रहा था.
इस खूनी युद्ध में तालिबान के साथ हजारो आम अफगानी भी मारे गए है, जबकि अमरीका के सैकड़ो सैनिक हताहत हुए. पिछले 18 वर्ष हे यह अप्रत्यक्ष युद्ध चल रहा था. अमरीका ने अफगानिस्तान में चल रही लड़ाई से पिछा छुड़ाने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन उसमें उसे सफलता नहीं मिली थी.
इस युद्ध में अमरीका के खरबो डाॅलर खर्च हो चुके थे और फिर भी इस लड़ाई का अमरीका को कोई जल्द समाधान मिलने की संभावना नहीं दिख रही थी. उधर अमरीका के साथ संघर्ष करते हुए तालिबान की भी कमर पूरी तरह से टूट चुकी थी. तालिबान ने अफगानिस्तान में अपना पूरा जनाधार खो दिया, जिससे वह भी अमरीका के साथ शांति करार करने के लिए मजबूर हो गया था.
अब इस शांति करार के बाद अमरीका अफगानिस्तान से अपने सारे सैनिक अगले 14 महिनों में वापिस बुला लेगा, वहीं तालिबान की ओर से अब अफगानिस्तान में कोई भी हमला ना करने की बात मान ली है. यह शांति समझौता अब क्या रंग लाता है, इसका उत्तर आने वाला समय ही दे सकता है.
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